मास्क कथा Mask

 

आज हम मास्क की चर्चा करेंगे मितुल..
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          😷 अथ मास्क कथा 😷
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मास्क शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच के मास्क्यू, इतालवी के मास्करा, लैटिन के मस्का से है जो अरबी के मसखरा से प्रभावित है......
इधर अपने देशज संदर्भ में अगर देखे तो मास्क का अर्थ होता है मुखौटा... अर्थात मुख को ओट में ले जाना...
तुम्हें पता ही है मितुल "छऊ" एक नृत्य है जो बंगाल, ओडिशा और बिहार में प्रचलित है.. ओडिया भाषा में ‘छऊ’ शब्द मुखौटे का पर्याय है जिसका अर्थ करते हुए शशधर आचार्य कहते हैं कि छ का मतलब है छाना और उ का मतलब है उपांग यानि किसी अंग को छा लेना. मुखौटा वहीं जो मुख पर छा जाए....

मोटे तौर पर मास्क की दो श्रेणियाँ की जा सकती हैं :-
1 ) चिकित्सीय विज्ञान के संदर्भ में
2 ) श्रव्य दृश्य माध्यमों यथा नृत्य, नाटक आदि के संदर्भ में
इस पहली किस्त में हम चिकित्सा से जुडे मास्क के बारे में कुछ जानकारी लेंगे मितुल...
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              चिकित्सा विज्ञान और मास्क
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चिकित्सा शास्त्र में मास्क प्रयोग का इतिहास बहुत पुराना है.. चित्रकला में मास्क की एक परिभाषा है..
– a membrane between the person and the world. अर्थात् एक व्यक्ति और विश्व के बीच की एक झिल्ली ही मास्क है... चिकित्सा शास्त्र के संदर्भ में इससे बेहतर परिभाषा नहीं मिलेगी..
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चोंच डाक्टर से पीपीई किट तक का सफर
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फ्रांस...आइसेनहाइम कम्यून...
आइसेनहाइम आल्टरपीस नामक संग्रहालय में मैथाइस ग्रुनेवर्ल्ड की एक पेंटिंग देखी जाती है जिसे उन्होंने 1512-1516 के दौरान बनाया होगा..यह एक मास्क है मितुल जिसकी नाक एक पक्षी के चोंच की तरह लम्बी है..नाक के अग्र भाग में दुर्गंध दूर करने के सुगंधित उपादान रखने की गुंजाइश रखी गई.. आंखों की जगह पारदर्शी कांच, सिर ढका हुआ और घुटने से नीचे जाता ओवरकोट.. इसे चोंच डाक्टर ( Dr.Beak ) या प्लेग डाक्टर भी कहा गया.. वह सोलहवीं शताब्दी की प्लेग महामारी का दौर था जिसमें इटली, फ्रांस, जर्मनी आदि देशों में हजारों लोग काल कवलित हो गए थे..प्लेग के अलावा चेचक और इनफ्लुएंजा का भी प्रकोप था..
मितुल, बर्लिन के इतिहास संग्रहालय में भी प्लेग डाक्टर का सिर आच्छादन ( headgear ) प्रदर्शित है जिसका स्वरुप आज के पीपीई किट की तरह ही है.. इसका सिर पृथक किया जा सकता है तथा इसकी नासिका भी गिद्ध के चोंच जैसी है...
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अतीत में घट गई महामारी से विश्व ने जो शिक्षा ली उसमें एक थी चेहरे पर झिल्ली का आवरण..
1910 -1911 के दौरान चीन में मन्चूरियन एपिडेमिक  के दौरान रोग प्रतिरोधक के रुप में मास्क के व्यवहार को उपयुक्त पाया..
इसके बाद एक भयंकर अवधि का साक्षी रहा जापान..   1918 -1920....न केवल जापान बल्कि चीन और विश्व के कुछ और देशों में फैल गया स्पैनिश फ्लू... ठीक ऐसे समय में जापान और चीन ने नए और सुरक्षित मास्क बनाने और उनके नियमित प्रयोग की परम्परा शुरु की..यह प्रथम विश्व युद्ध के बाद विभिन्न देशों में विभिन्न प्रकार की रोग व्याधि का समय था...
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न केवल महामारी से बचाव बल्कि आपरेशन के समय भी चिकित्सकों को भी मास्क का व्यवहार जरुरी लगने लगा ताकि आपरेशन के दौरान रोगी किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचा रहे...
इस तरह देखा जाए तो मितुल चेहरे पर लिपटी हुई यह झिल्ली, मुखोटा, नकाब या मास्क बहुत ही कारगर होता है वायरस के प्रवेश को रोकने में...
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मितुल, मास्क के विविध मंचीय चरित्रों का जिक्र फिर कभी..
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© देवदीप
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