1980...मैं और बलवंत तक्षक...दोनों दो साइकिल पर सवार अलवर के समस्‍त साहित्‍यकारों/बुद्धिजीवियों के पास दौडते थे,,,नवनिर्मित संस्‍था पलाश के किसी भी आयोजन के दौरान..प्रयास सफल होता गया....अलवर में साहित्यिक और नाट्य गतिविधियां बढने लगी....एक संस्‍था से दो..दो से तीन....1987 के अंतिम माह में मैंने अलवर छोडा...तब तक ईशमधु भी अलवर छोड चुके थे...संभवतया अशोक राही भी...अलवर के 'अरानाद' और 'अरूणप्रभा' अखबार ने कई संभावनाशील पत्रकारों को जन्‍म दिया...अशोक शास्‍त्री,ईशमधु तलवार,जगदीश शर्मा,बलवंत तक्षक,अशोक राही,सुनील बिज्‍जू,हरप्रकाश मुंजाल,राजेश रवि,कपिल भट्ट इत्‍यादि.....7 दिसंबर को लगभग 20 साल बाद बलवंत के साथ था चंडीगढ में...वह अब दैनिक 'आज समाज' में चीफ एशोसियेट एडीटर है....जनसत्‍ता और दैनिक भास्‍कर के अपने लम्‍बे अनुभव को साथ लेकर...उन दिनों के फाकाकश समय की मेहनत ने ही उसे इस मुकाम पर पंहुचाया...मैं गर्वित महसूस कर रहा था......

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